दत्ताबाद हत्याकांड : पुलिस की चार्जशीट से बीडीओ का नाम नदारद
कोलकाता। साल्टलेक के दत्ताबाद इलाके में सर्राफा व्यापारी स्वपन कामिल्या के अपहरण और सनसनीखेज हत्याकांड में पुलिस की भूमिका एक बार फिर कठघरे में है। बुधवार को बिधाननगर पुलिस कमिश्नरेट द्वारा दाखिल की गई चार्जशीट ने नए विवाद को जन्म दे दिया है। हैरानी की बात यह है कि जिस राजगंज के पूर्व बीडीओ प्रशांत बर्मन पर इस पूरी साजिश का मुख्य सूत्रधार होने का आरोप था, उनका नाम इस चार्जशीट से गायब है। पुलिस के इस कदम ने न केवल मृतक के परिवार को स्तब्ध कर दिया है, बल्कि जांच की निष्पक्षता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सर्वोच्च न्यायालय ने प्रशांत बर्मन को 23 जनवरी तक आत्मसमर्पण करने का कड़ा निर्देश दिया था। बावजूद इसके, वह अब तक कानून की पहुंच से दूर हैं और पुलिस उन्हें ढूंढने में पूरी तरह नाकाम साबित हुई है। परिजनों का आरोप है कि जब प्राथमिकी में उनका नाम स्पष्ट रूप से दर्ज था और घटना वाले दिन सीसीटीवी फुटेज में उनकी मौजूदगी के दावे किए गए थे, तो चार्जशीट में उन्हें क्लीन चिट देना न्याय का गला घोंटने जैसा है। गौरतलब है कि जांच के शुरुआती चरणों में पुलिस ने बर्मन के कई करीबियों को धर-दबोचा था, जिनसे पूछताछ में कई अहम सुराग मिले थे। इसी दबाव के बीच प्रशांत बर्मन ने निचली अदालतों से अग्रिम जमानत हासिल कर ली थी, जिसे बाद में ऊपरी अदालतों में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख और उन्हें पद से हटाए जाने के बाद माना जा रहा था कि पुलिस अब उन पर शिकंजा कसेगी, लेकिन बुधवार को दाखिल आरोप पत्र ने कहानी ही पलट दी। चार्जशीट में पांच अन्य आरोपियों के नाम तो शामिल हैं, लेकिन मुख्य नामजद आरोपी का बाहर होना पुलिसिया कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा कर रहा है।
कानूनी विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं का कहना है कि यह रहस्यमय चूक बिना किसी बड़े प्रभाव के संभव नहीं है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या फरार चल रहे पूर्व बीडीओ अब भी पर्दे के पीछे से जांच को प्रभावित कर रहे हैं? उधर, मृतक व्यापारी के परिवार में अब अपनी सुरक्षा को लेकर भी डर बैठ गया है। उन्होंने मांग की है कि मामले की दोबारा निष्पक्ष जांच हो और मुख्य आरोपी को बचाने की किसी भी राजनीतिक या प्रशासनिक कोशिश को नाकाम किया जाए। 6 तारीख को जब यह चार्जशीट बारासात कोर्ट में पेश होगी, तब देखना होगा कि अदालत इस पर क्या रुख अपनाती है।